‘The Mother’ – Chapter 1 (with text in Hindi)


‘The Mother’ was first published in 1928. It consists of six chapters, all of which has a separate history. Chapter 1 is an essay Sri Aurobindo wrote as a message for distribution on 21 February 1927, the birthday of the Mother. Three months earlier, after an important spiritual experience of 24 November 1926, Sri Aurobindo had withdrawn from outward contacts and placed the Mother in charge of the disciples who had gathered around him. He told them at that time to turn entirely to her for spiritual and practical guidance. This message therefore had a special significance in its immediate historical context. In 1928 it was published as the first chapter of The Mother.

THE MOTHER

Chapter 1

दो शक्तियां हैं जिनके मिलने से ही वह महत् और दुरूह कार्य संपन्न हो सकता है जो हमारे प्रयास का लक्ष्य है, एक है वह दृढ़ और अभंग अभीप्सा जो नीचे से आवाहन करती है और दूसरी वह भागवत प्रसादरूपा शक्ति जो ऊपर से उसका उत्तर देती है।

परंतु भागवत प्रसाद-शक्ति केवल प्रकाश और सत्य की ही स्थितियों में कार्य करती हैं; असत्य और अज्ञान उन पर जो अवस्थाएं लाद देना चाहते हैं उन अवस्थाओं में उनका कार्य नहीं होता। कारण असत्य जो कुछ चाहता है वह यदि उन्हें मंजूर हो जाये तो वे अपने ही व्रत से च्युत हो जायें।

प्रकाश और सत्य की स्थिति ही एकमात्र स्थिति है जिसमें वे परमा शक्ति नीचे उतर आती हैं; और विज्ञानमयी परमाशक्ति का ही यह काम है कि वे ऊपर से नीचे उतर कर और नीचे से ऊपर की ओर खुलकर इस भौतिक प्रकृति पर अपने अप्रतिहत कर्तृत्व का स्थापन और इसकी कठिनाइयों का ध्वंस कर सकती हैं। … होना चाहिये पूर्ण और सच्चा समर्पण, भागवती शक्ति की ओर अनन्य आत्मोद्घाटन, सत्य जो नीचे अवतरण कर रहा है उसका प्रतिपद, प्रतिक्षण अखण्ड ग्रहण और आये दिन पार्थिव प्रकृति का शासन किये चलनेवाले मनोगत, प्राणगत और देहगत आसुरी शक्तियों और रूपों के मिथ्यात्व का सतत सर्वथा परिवर्जन।

समर्पण होना चाहिये संपूर्ण, देही के एक-एक अंग और प्रत्यंग को लिये हुए। इतना ही यथेष्ट नहीं है कि हृत्पुरुष मान ले, आंतर मानस स्वीकार कर ले या अंतःप्राण नत हो जाये और देह की अंतश्चेतना भी उससे प्रभावान्वित हो; प्रत्युत पुरुष के किसी भी अंग में, बाह्यातिबाह्य अंग में भी कोई ऐसी चीज नहीं होनी चाहिये जिसमें किसी प्रकार का कोई संकोच हो, जो किसी प्रकार के संशय, व्यामोह और लुकाव-छिपाव के पीछे अपने-आपको छिपाये रहती हो, जो विद्रोही हो, समर्पण में असम्मत हो।

यदि सत्ता का कोई अंग समर्पण करे और कोई दूसरा अंग जहां-का-तहां अड़ा रह जाये, अपने ही रास्ते पर चलता चले या अपनी शर्तों को सामने रखे तो यह समझ लो कि जब-जब ऐसा होगा तब-तब तुम आप ही उस भागवती प्रसाद-शक्ति को अपने पास से दूर हटा दोगे।

यदि अपनी भक्ति और समर्पण के पीछे तुम अपनी इच्छाओं को, अहंकार की अभिलाषाओं और प्राणों के हठों को छिपा रखोगे, अपनी सच्ची अभीप्सा के स्थान में इन चीजों को ला रखोगे या अपनी अभीप्सा में इन्हें मिला दोगे तो यह समझ लो कि भगवत्प्रसाद-शक्ति का इसलिये आवाहन करना कि वे तुम्हारा रूपांतर करें, बिलकुल बेकार है।

यदि एक तरफ से या अपने एक अंग से तुम सत्य के सम्मुख होते हो और दूसरी तरफ से आसुरी शक्तियों के लिये अपने द्वार बराबर खोलते जाते हो तो यह आशा करना व्यर्थ है कि भगवत्प्रसाद-शक्ति तुम्हारा साथ देंगी। तुम्हें अपना मंदिर स्वच्छ रखना होगा यदि तुम चाहते हो कि भगवती जाग्रत् रूप से इसमें प्रतिष्ठित हों।

हर बार जब वे आती और सत्य को प्रविष्ट कराती हैं तब तुम यदि उनकी ओर पीठ फेर दो और फिर उसी मिथ्यात्व को बुला लो जिसका एक बार त्याग कर चुके हो तो ये भगवती का दोष नहीं जो वे तुम्हारा साथ न दें, बल्कि यह तुम्हारे अपने संकल्प के मिथ्याचार और तुम्हारे समर्पण की अपुर्णता का दोष है।

यदि तुम सत्य का आवाहन करते हो और फिर भी तुम्हारी कोई वृत्ति किसी ऐसी चीज को ग्रहण करती है जो मिथ्या, मूढ़ और अभागवत है अथवा ऐसी चीज का सर्वथा त्याग करना नहीं चाहती तो तुम्हारे ऊपर आक्रमण करने के लिये शत्रु को खुला रास्ता मिलता रहेगा और भगवत् प्रसादमयी भागवती शक्ति तुमसे पीछे हटती रहेंगी। पहले यह ढूंढ़ निकालो कि तुम्हारे अंदर कौन-सी चीज है जो मिथ्या या तमोग्रस्त है और उसका सतत त्याग करो; तभी तुम इस योग्य होगे कि ठीक तरह से भागवती शक्ति का इसलिये आवाहन करो कि वे आकर तुम्हारा रूपांतर साधित करें।

यह मत समझो कि सत्य और मिथ्या, प्रकाश और अंधकार, समर्पण और स्वार्थ-साधन एक साथ उस गृह में रहने दिये जाएंगे जो गृह भगवान् को निवेदित किया गया हो।

रूपांतर होगा सर्वांगीण, इसलिये जो कुछ उस रूपांतर में बाधक है उसका त्याग भी होना होगा सर्वांगीण।

इस मिथ्या धारणा को त्याग दो कि तुम चाहे भगवन्निर्दिष्ट पथ पर न भी चलो तो भी भागवती शक्ति तुम्हारे लिये, तुम जब जैसा चाहोगे, सब कुछ किया करेंगी या उनको करना ही पड़ेगा। अपना समर्पण सच्चा और संपूर्ण करो, तभी तुम्हारे लिये बाकी सब कुछ किया जायेगा।

अज्ञान और आलस्य में पड़े-पड़े यह भी मत सोचो कि भागवती शक्ति ही तुम्हारे लिये समर्पण भी कर देंगी। भगवान् भागवती शक्ति के प्रति तुम्हारा आत्मसमर्पण चाहते हैं, पर जबर्दस्ती किसी से आत्मसमर्पण नहीं कराते; तुम्हारी स्वाधीनता सदा अक्षुण्ण है, जबतक रूपांतर-साधन उस अवस्था तक नहीं पहुंचता जहां से उसका च्युत होना असंभव है तबतक यह सर्वथा तुम्हारे अधिकार में है कि तुम जब चाहो भागवती शक्ति को अमान्य कर सकते हो या जब चाहो अपना समर्पण लौटा ले सकते हो, यदि उसका आध्यात्मिक फल भी भोगने को साथ-साथ तैयार हो। तुम्हारा समर्पण स्वेच्छाकृत और स्वच्छन्द होना चाहिये, किसी सजीव सत्ता का-सा, जड़ कठपुतली या परवश यंत्र का-सा नहीं।

प्रायः यह भूल हुआ करती है कि तामसिक निश्चेष्टता को वास्तविक समर्पण समझ लिया जाता है, पर तामसिक निश्चेष्टता से किसी भी सच्चे और शक्तिशाली पदार्थ का उद्भव नहीं हो सकता। अपनी तामसिक निश्चेष्टता के कारण ही भौतिक प्रकृति प्रत्येक तामस और आसुर प्रभाव का शिकार बना करती है।

भागवती शक्ति के कर्म करने के लिये साधक में उसके प्रति ऐसी अधीनता होनी चाहिये जो प्रसन्न, बलशाली और सहायक हो और ऐसी आज्ञाकारिता होनी चाहिये जो सत्य के ज्ञानदीप्त अनुयायी को, अंतर्जगत् में अंधकार और असत्य से लड़नेवाले वीर योद्धा को, भगवान् के सच्चे सेवक को शोभा दे।

यही सच्चा मनोभाव है और जो कोई इसे ग्रहण और धारण कर सकते हैं उन्हींकी श्रद्धा निराशाओं और विपत्तियों के बीच में भी सदा अटल बनी रह सकती है और वे ही इसकी कठिन अग्निपरीक्षा से उत्तीर्ण होकर उस परम विजय और चरम रूपांतर को प्राप्त हो सकते हैं।

 

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